“माया”

सोचा नहीं कभी कुछ पाना किसने कितना क्या पाया है , जो भी मिला जिसको उसने

उतना ही पाया है , रास कभी भी किसी को नहीं आता खोया ज़्यादा पाया कम यह

यह याद सभी को रह जाता है, जो पाया है वह सुख है या दुख यह तो अभी

तक समझ भी नहीं आया , झूठा लगता है ये संसार ,झूठी ही है ये काया, भोगा सब कुछ

पर सारा व्यर्थ में ही गँवा दिया है, कभी भी नहीं सोचा क्या पाया और क्या खोया है ,

Never thought who ever got anything, how much, what he got, whatever he got

As much as it is found, Raas never comes to anyone;

Everyone remembers this, what they have found is happiness or sorrow

Did not even understand, this world seems to be false, this body is false, it suffers everything

But all is lost in vain, never thought what was found and what was lost,

(क) मिथलेशसिगल