“इच्छा”

इच्छा ही प्रेम है जब तक हमारे मन में धधकती हुई इच्छा नहीं होगी तब तक हमें उसे पूरी शिद्दत से महसूस करना होगा , जैसे खिलाड़ी खेलना चाहता है ,कोई पेंटर पेंटिंग बनाना चाहता है, उसे हमें

तहेदिल से बनाना होगा क्योंकि इच्छा प्रेम की ही एक भावना है यदि हम किसी खेल ,अभिनय, गायन, वादन, शौक़ या अपने। काम-काज में बेहतर बनना चाहते हैं या ड्राइविंग करना चाहते। है तो हमें अपनी उसी शिद्दत से इच्छाओं को मज़बूत बना कर आगे आना होगा तभी हमारी इच्छा शक्ति की पूर्ति होगी,

Desire is love until we have a burning desire, then we have to feel it with full vigor, like a player wants to play, a painter wants to make a painting, he has to give us

Will have to be made wholeheartedly because desire is only a feeling of love if we are playing, acting, singing, playing, hobby or ourselves. Want to get better at work or driving. If we have to strengthen our desires with the same strength, then only our will power will be fulfilled,

(c)Mithlesh Singhal